संसद के उच्च सदन राज्यसभा में इस समय कुल 19 सरकारी विधेयक ऐसे हैं जो वर्षों से लंबित पड़े हैं। इनमें सबसे पुराना विधेयक वर्ष 1992 का है, जो जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ा हुआ है। तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस विधेयक पर सदन में न तो चर्चा पूरी हो सकी और न ही कोई अंतिम निर्णय लिया गया।
राज्यसभा संसद का स्थायी सदन है, जो कभी भंग नहीं होता। इसके विपरीत लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर वहां लंबित सभी विधेयक स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि राज्यसभा में पेश किए गए विधेयक तब तक जीवित रहते हैं जब तक उन पर सदन कोई ठोस निर्णय नहीं ले लेता।
संसदीय प्रक्रिया के तहत यदि राज्यसभा में प्रस्तुत किसी विधेयक पर बहस नहीं होती या उसे पारित अथवा निरस्त नहीं किया जाता, तो वह वर्षों तक लंबित बना रहता है। वर्तमान में भी ऐसे ही 19 विधेयक विभिन्न कारणों से लंबित हैं।
इनमें सबसे अधिक पुराना 79वां संविधान संशोधन विधेयक है, जो वर्ष 1992 में राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया था। यह विधेयक देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित माना जाता है। समय के साथ सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, लेकिन यह विधेयक आज भी कागज़ों में अटका हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा में विधेयकों का लंबित रहना केवल राजनीतिक असहमति का परिणाम नहीं होता, बल्कि कई बार प्राथमिकताओं में बदलाव, विधायी एजेंडा का बोझ, और संसदीय गतिरोध भी इसके पीछे बड़ी वजह बनते हैं।
राज्यसभा में वर्षों से लंबित ये विधेयक भारतीय संसदीय प्रणाली की एक ऐसी हकीकत को सामने लाते हैं, जहां कानून बनाने की प्रक्रिया समय के साथ ठहर भी जाती है।
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Author: haryanadhakadnews
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