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सलमान खान की ‘बैटल ऑफ गलवन’ पर विदेश मंत्रालय का बयान

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अभिनेता सलमान खान की आगामी फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवन’ को लेकर विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत में फिल्मों के निर्माण से जुड़े सभी मामलों का फैसला संबंधित प्राधिकरण करते हैं और इस प्रकार की किसी भी परियोजना में मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं होती।

यह फिल्म वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवन घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प पर आधारित बताई जा रही है—एक ऐसी घटना जिसने भारत-चीन संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित किया और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सैन्य साहस के संदर्भ में देशव्यापी चर्चा का विषय बनी।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मंत्रालय को फिल्म की योजना की जानकारी है, लेकिन फिल्म निर्माण की प्रक्रिया सरकार के अन्य सक्षम संस्थानों के अधीन आती है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“हमें इस तरह की फिल्म की योजना के बारे में जानकारी मिली है। भारत में फिल्म निर्माण से जुड़े मामलों को संबंधित प्राधिकरण देखते हैं। विदेश मंत्रालय की इसमें या ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट में कोई भूमिका नहीं है।”

फिल्म और कूटनीतिक संवेदनशीलता

गलवन घाटी की झड़प भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक रही है। जून 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई इस मुठभेड़ में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की वार्ताएं हुईं।

ऐसे संवेदनशील विषय पर फिल्म बनने को लेकर स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय और राजनीतिक स्तर पर भी चर्चाएं तेज हैं। हालांकि विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इस तरह के क्रिएटिव या सिनेमाई प्रोजेक्ट्स में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होता।

17 अप्रैल को प्रस्तावित रिलीज

सूत्रों के अनुसार, ‘बैटल ऑफ गलवन’ 17 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। फिल्म को देशभक्ति और सैन्य पराक्रम की थीम पर तैयार किया गया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फिल्म में गलवन की वास्तविक घटनाओं को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है और दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

सेंसर और अन्य प्राधिकरणों की भूमिका

भारत में किसी भी फिल्म को रिलीज से पहले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त रक्षा, गृह या अन्य मंत्रालय भी केवल तभी हस्तक्षेप करते हैं जब किसी कंटेंट का सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा या संवेदनशील आधिकारिक सूचनाओं से हो।

विदेश मंत्रालय का यह बयान इसी संस्थागत ढांचे को दोहराता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि फिल्म से जुड़े सभी निर्णय सामान्य नियामक प्रक्रिया के तहत ही लिए जाएंगे।

राष्ट्रवाद आधारित फिल्मों का बढ़ता चलन

पिछले कुछ वर्षों में सैन्य अभियानों, सीमा विवादों और वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्मों की संख्या बढ़ी है। दर्शकों के बीच ऐसे विषयों को लेकर उत्साह भी देखा गया है। ‘बैटल ऑफ गलवन’ इसी श्रेणी की एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जा रही है।

विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट दूरी बनाए जाने के बाद अब पूरी निगाहें फिल्म की रिलीज और उसके प्रभाव पर टिकी हैं।

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