साल 2026 की शुरुआत भारत के पड़ोसी देशों के लिए राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल—तीनों ही देश इस समय गहरे अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं, सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है और सत्ता संरचनाओं में असामान्य बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को लेकर लगातार विवाद गहराता जा रहा है। विपक्षी दलों के आरोप, सीमित राजनीतिक भागीदारी और प्रशासनिक दबाव के कारण देश की आंतरिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। इसका असर न केवल घरेलू राजनीति पर, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन पर भी पड़ सकता है।
वहीं पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासन की तुलना में सेना का प्रभाव लगातार बढ़ता दिख रहा है। राजनीतिक नेतृत्व कमजोर होता जा रहा है और निर्णय प्रक्रिया में सैन्य हस्तक्षेप खुलकर सामने आ रहा है। आर्थिक बदहाली, आतंकवाद और सत्ता संघर्ष ने पाकिस्तान को एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है।
नेपाल में स्थिति अलग होते हुए भी उतनी ही चिंताजनक है। यहां बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार सरकारों के बदलने से युवा वर्ग में गहरा असंतोष पैदा हो गया है। गुस्साई और हताश युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर रही है, जिससे सामाजिक तनाव और शासन की चुनौतियां और बढ़ रही हैं।
इन तीनों देशों में जारी अस्थिरता का प्रभाव केवल उनकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा, कूटनीतिक रणनीति और दक्षिण एशिया में उसकी क्षेत्रीय भूमिका पर पड़ सकता है। सीमापार अवैध गतिविधियां, शरणार्थी संकट और भू-राजनीतिक दबाव भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।
ऐसे हालात में भारत की ‘Neighbourhood First Policy’ अब तक की सबसे कठिन परीक्षा के दौर से गुजरने वाली है। नई दिल्ली के सामने यह चुनौती होगी कि वह पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में संतुलन बनाए रखते हुए क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा और सहयोग को कैसे सुनिश्चित करती है।
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Author: haryanadhakadnews
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